हुस्न का जाल
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प्रतीक चित्र |
‘‘मेरी
ससुराल रामगढ में और मायका दीनापुर में है।’’ फिर उसने अपने साथ आए युवक की ओर इशारा
किया था, ‘‘यह मेरा भतीजा कालिया है हुजूर।’’
‘‘कहो...’’
उसे घूरते हुए रावत ने पुिलसिया अन्दाज में जानना चाहा था, ‘‘किस लिए आए हो यहां....
?’’
उस वक्त
सुबह के दस ही बजे रहे होंगे और रावत अभी कुछ ही देर पहले आफिस में आया था।
‘‘हुजूर
इसके बाप रामा की मौत हो गई है। उसके दाह-संस्कार में हिस्सा लेने ही में सुबह ससुराल
से आई हूं।’’ गंगाबाई रो पड़ी। ‘‘ कहने को तो वह मौत ही है हुजूर, मगर मुझे शक है कि
मेरा भाई मरा नहीं है, बल्कि किसी ने उसे मार डाला है।’’
‘‘क्या
उसकी किसी से दुश्मनी थी।’’
‘‘बाहर
तो किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, मगर उसकी अपनी बीबी से नहीं बनती थी और मुझे शक है
कि उसी ने मेरे भाई को मारा है। वह मेरे भाई की दूसरी बीबी है।’’
‘‘क्यों....
’’ रावत एकाएक उसकी बात का यकीन न कर सका था। ‘‘उस औरत को भला अपना सुहाग उजाड़ने की
क्या जरूरत थी।’’
‘‘बताते
हुए तो शर्म आती है हूजूर।’’ गंगाबाई का सिर पहले से भी ज्यादा झुक गया था, मगर सच
को सामने लाने के लिए बताना ही होगा..... मेरी भाभी बदचलन और आवारा किस्म की औरत है
हुजूर।’’
‘‘तुम यह
कैसे कह सकती होे कि वह बदचलन और आवारा किस्म की औरत हैं।’’
रावत को
उसकी बातों में कुछ-कुछ सच्चाई दिखाई देने लगी थी, ‘‘क्या इस बारे में कभी तेरे भाई
ने तुम से कुछ कहा था?’’
‘‘कुछ दिन
पहले जब वह मुझसे मिलने मेरी ससुराल आया था, तो उसने बातों ही बातों में कहा था कि
मेरी भाभी बसंती अपने पड़ोसी संजय से बहुत ज्यादा हिल-मिल गई हैं।’’ गंगाबाई ने बताया
था, ‘‘उसने यह भरी कहा था हुजूर कि उसे उन दोनों का मिलना पसन्द नही हैं।’’
‘‘यह संजय
इस वक्त कहां मिल सकता है।’’
‘‘वह शहर
में ठेकेदार राम मनोहर के पास मिस्त्राी का काम करता है हुजूर।’’ देर से खामोश खड़े
कालिया ने पहली बार मुंह खोला था, ‘‘ पिछली बार जब वह गांव आया था तो उसने बताया था
कि दूसरे मजदूरों के साथ वह भी रेलवे स्टेशन के पास वाले मैदान में झोपड़ी बनाकर रहता
हैं।’’
‘‘तो क्या
वह हर रोज वहां से तेरी मां से मिलने आया करता था।’’
‘‘वह हमारे
गांव का ही है हुजूर।’’ उसकी बात तीर की मानिंद कालिया को चुभी तो थी, मगर वह अपनी
मजबूरी से भी अन्जान नहीं था। अपमान को पी जाने में ही अपनी भलाई समझकर उसने बताया
था, ‘‘अभी महीना भर पहले ही वह शहर गया है।’’
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प्रतीक चित्र |
‘‘अगर तेरा
यह शक सही निकला कि तेरे भाई को मारा गया है।’’ रावत गंगाबाई की ओर देखता हुआ बोला
था, ‘‘तो यह पता लगाना भी जरूरी है कि यह काम उसने अकेले ही किया था या उसके साथ कोई
दूसरा भी था।’’ फिर उसने गंगाबाई को बोलने का मौका दिए बगैर ही कहा था, ‘‘तुम एक काम
करो..... ’’
‘‘क्या
हुजूर...... ’’
‘‘मुंशी
जी के पास अपनी शिकायत दर्ज करवा दो..... मैं तेरे भाई के पोस्टमार्टम का इन्तजाम करता
हूं।’’
उसी शाम
करीब छः बजे पोस्टमार्टम के बाद डाक्टर ने रामा की लाश रावत की मौजूदगी में रामा के
परिवार वालों को सौपते हुए कहा था, ‘‘रिर्पोट आपको चैथे दिन शाम को ही मिल सकेगी।’’
बसंती भी
उस वक्त वहीं मौजूद थी। उसने रावत से बात भी करनी चाही थी, मगर रावत उसे अन्देखा करते
आगे बढ़ गया था।
‘‘तेरा
शक एकदम सही है।’’ चैथे दिन शाम को जब गंगाबाई कालिया को साथ लेकर रावत से मिलने गई्र
थी, तो रावत ने उन्हें पोस्टमार्टम रिर्पोट के बारे में बताया था, ‘‘रामा को किसी कपड़े
से गला घोटकर मारा गया था.... ’’
‘‘तो....
तो फिर..... ’’ गंगाबाई सच्चाई जानते ही उत्तेजित हो गई थी, ‘‘उस कुलटा को हिरासत में
ले लीजिए हुजूर।’’
‘‘क्या
तुम बसंती की बात कर रही हो?’’
‘‘हां....
उसी ने तो मारा है, मेरे भाई को.... ’’
‘‘फिलहाल
मेरे पास उसके खिलाफ कोई सबूत नही है और सबूत के बिना किसी को भी दोषी करार नहीं दिया
जा सकता।’’ रावत ने समझाया था, मेरे आदमी छानबीन कर रहे है। जैसे ही हमें किसी के भी
खिलाफ कोई सबूत मिल गया। उसी वक्त हम उसे हिरासत में ले लेगें।’’
रावत के
बाहर आते ही जग्गू उनके पास पहुंच गया। जग्गू को देखते ही रावत ने चहकते हुए पूछा,
‘‘क्या खबर लाए हो?’’
‘‘अपने
खसम का दाह-संस्कार करने के बाद वह पेट दर्द का बहाना बनाकर अस्पताल में दाखिल हो गई
है।’’
‘‘यह तो
कोई खबर नही है?’’
‘‘खबर है.....
इसलिए तो बताने आया हूं।’’
बिना कुछ
कहे ही रावत सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखता रहा।
‘‘उसी रात
ग्यारह बजे वह अपने बिस्तर से उठ कर कहीं चली गई थी।’’ जग्गू ने रहस्यमय अन्दाज में
बताया था, ‘‘और सुबह पांच बजे तक वापस नही आई थी..... यह बात सिर्फ उसी रात की नही
हैं..... वह रात को अपने बिसतर से इसी तरह गायब रहती है।’’
‘‘अब यह
खबर बनने लगी है।’’ रावत ने सिगरेट सुलगाने के बाद जिज्ञासा भरी निगाहें उसके चेहरे
पर टिकाते हुए पूछा, ‘‘कहां जाती है वह रात को.... ’’ फिर उसने अपने सवाल का जबाब भी
खुद ही सवालिया अन्दाज में दे डाला, ‘‘कहीं वह अपने किसी यार के साथ रंगरलियां मनाने
तो नही जाती है?’’
‘‘मेरा
भी यही ख्याल है कि वह अपने जिश्म की आग बुझाने के लिए ही रात भर अपने बिस्तर से गायब
रहती है।’’
‘‘तूने
उसका पीछा किया था?’’
‘‘नही.....
’’ जग्गु ने उसका पीछा न करने की वजह बताई थी, ‘‘एक तो गांव का मामला है साहब, दूसरे
अपनी पोल खुल जाने के डर से वह अपने यार से मिलकर मेरी भी बोली बंदकर सकती है।’’ जग्गू
धीरे से हंसा था, ‘‘और मैं अभी मरना नही चाहता हूं।’’
‘‘ठीक है,
तुम जाओ।’’ सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश लेते हुआ रावत उठ खड़ा हुआ, ‘‘ अब मैं देखता हूं
कि मुझे क्या करना है।’’
उसी रात
दस बजे के आस-पास रावत मेकअप में पहले अस्पताल जाकर इस बात का यकीन कर लिया कि बसंती
अपने बिस्तर पर ही है। फिर वह अस्पताल के बाहरी गेट के पास ऐसी जगह छुप गया जहां से
अस्पताल के अन्दर-बाहर आने-जाने वालों पर नजर रखी जा सकती थी।
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प्रतीक चित्र |
करीब आधे
घंटे बाद ही उसे हल्की सी रोशनी में एक परछाई सी बाहर आती हुई दिखाई दी। रावत सावधान
हो गया। जब वह परछाई गेट के पास पहंुची तो रावत को उसे पहचानने में जरा सी भी दिक्कत
नही हुई। वह बसंती ही थी, गेट पर रूककर बंसती ने पलटकर पीछे के ओर देखा। जब उसे इस
बात का यकीन हो गया कि उसका पीछा नही किया जा रहा है, तो वह तेज कदमों से एक तरफ बढ़ने
लगी।
कुछ ही
देर चलने के बाद बंसती एक झोपड़ी में दाखिल हो गई। इस बार उसने पलटकर देखने की भी जरूरत
नही समझी, मानो उसे यकीन था कि न तो उस पर किसी को शक ही था और न ही कोई उसका पीछा
कर रहा था।
रावत झोपड़ी
के बाहर ही रूककर अन्दर से आने वाली आवाजों को सुनने की कोशिश करने लगा।
‘‘तुम से
कितनी बार कह चुका हूं.... ’’ झोपडी में जलने वाला दीपक बुझा दिया गया था, भीतर से
किसी मर्द की दबी हुई आवाज उभरी थी, ‘‘ .... कि यहां मत आया करो, अगर किसी को मामूली
सा भी शक हो गया तो हमारा सारा खेल ही बिगड़ जाएगा।’’
‘‘अगर किसी
को शक हो भी गया तो कोई हमारा क्या बिगाड़ लेगा।’’ बसंती ने उसे दिलसा दिया था।
‘‘मुझे
तो वह पुलिस वाला..... ’’
रावत समझ
रहा था कि यह बात उसी के बारे में कही जा रह थी।
‘‘वह भी
आशिक मिजाज लगात है। अगर वह मुझे पहले मिल गया होता, तो उस बुड्ढे की बोली मैं उससे
ही बंद करवाती..... अब भी कुछ नही बिगड़ा है। कल ही उससे मिलकर उसे ऐसे जाल में फंसा
लूंगी कि साला सारी छानबीन करवाना भूलकर कुत्ते की तरह मेरे कदम चूमता फिरेगा।’’
‘‘और अगर
वह न माना तो क्या होगा?’’
‘‘तब क्या
होगा..... ’’ बसंती उसकी बातों से डरी नही थी, ‘‘यह तो मुझे नही मालुम है। हां यह जरूर
बता सकती हूं कि अब क्या होगा..... ’’
‘‘अब.....
अब क्या होगा?’’
‘‘वही.....
’’ बसंती चहकी थी, ‘‘जो हर रात को होता है।’’
इससे कुछ
देर बाद ही चारपाई की चरमराहठ, बंसती की सिसकारियों के साथ युगलबंदी करने लगी थी। यह
सुनकर रावत मुस्करा उठा।
अगले दिन
शहर से लेडी पुलिस बुलाकर रावत ने बसंती और कालिया को हिरासत में ले लिया। पूछताछ के
दौरान पहले तो दोनों अपने आप को बेगुनाह बताते रहे। लेकिन जब रावत ने पुलिसिया रूख
अपनाया तो उन्होंने अपना गुनाह कबूल कर लिया। अगर गंगाबाई को उन पर शक न हो गया होता
तो उम्र भर उनके गुनाह पर से पर्दा न उठ सका होता।
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